पटना पर भी मंडरा रहा चेन्नई जैसी तबाही का खतरा

चेन्नई में भारी बरसात से जो तबाही का मंजर दिख रहा है उसे प्राकृतिक आपदा मानना भारी भूल हो सकती है. हकीकत तो यह है कि इसके लिए हम खुद जिम्मेदार है और साथ ही यह खतरा अब देश के हर छोटे बड़े शहरों पर मंडरा है.

आप ये सोचकर आश्चर्यचकित मत होइए कि चेन्नई की आपदा के लिए हम कैसे जिम्मेदार है. इन घटनाओं से जो बात निकलकर सामने आ रही है उनके अनुसार इस तबाही के लिए कोई और नहीं बल्कि वहां रह रहे लोग ही जिम्मेदार हैं. आइये आपको बताते हैं हम किस खतरे की बात कर रहे हैं.

दरअसल गूगल ने कुछ तस्वीरें जारी की हैं जिनमे आज से 15 साल पहले के चेन्नई और आज के चेन्नई के बीच के अंतर को दिखाया गया है. इन्ही तस्वीरों में छुपा है वो राज जो बताएगा कि इस तबाही के लिए कौन जिम्मेदार है. यहाँ फिर से ये बात जान लें कि कभी न कभी बिहार के पटना जैसे शहरों को भी ऐसी तबाही से जूझना पड़ सकता है.

तस्वीरों में बताया गया कि इंसान बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ गया कि उसने भविष्य के बारे में सोचने की जहमत तक नहीं उठाई और नतीजा सबके सामने है. ये देखने से साफ़ होता है कि साल 2000 में शहर में जिन जगहों पर पानी जमा होने के लिए झील और तालाब हुआ करते थे अब उन जगहों पर इंसान की बनाई हुई इमारतें खड़ी हो चुकी हैं. वहां की वेलाचेरी, पल्लीकारानेई और ओल्ड महाबलीपुरम की करीब 5500 हेक्टेयर जमीन पर कमर्शियल रियल एस्टेट का कब्जा हो चुका है.

हमारी बनायीं इन इमारतों की वजह से बारिश का पानी निकलने के लिए सिर्फ सड़कें ही बची हैं और इस वजह से चेन्नई के कई इलाके हल्की बारिश में भी पानी से लबालब भरे रहते हैं. और कमोबेश यही स्थिति पटना सहित तेजी से आधुनिक होते तथा शहरीकरण की ओर बढ़ते सभी शहरों की है.

ऐसी समस्याओं से निपटने का एक ही उपाय हो सकता है कि फिलहाल बेतरतीब निर्माण के कार्य पर रोक लगा दी जाए. तेजी से हो रहे निर्माण न सिर्फ शहरों को प्रदूषित कर रहे है बल्कि जल निकासी में भी बाधा बन रहे हैं. इसके लिए राज्य सरकारों को सख्ती से कई अहम कदम उठाने पड़ेंगे.

इधर चेन्नई में हो रही तेज बारिश का असर बिहार में भी दिखने लगा है. बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र, हिमाचल के ऊपर टर्फ लाइन व तमिलनाडु में वर्षा के कारण कल शाम में ही राजधानी पटना सहित अनेक हिस्सों में हल्की बूंदाबांदी हुई.

हालांकि मौसम विभाग के अनुसार यहां तक आते-आते सिस्टम कमजोर हो चुका है इसलिए बिहार को चक्रवात जैसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा. मगर शहरीकरण की अंधी दौड़ में हम प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ कर रहे हैं उसपर रोक लगानी जरुरी है अन्यथा कभी भी हमें चेन्नई जैसी ही तबाही देखने को मिल सकती है.

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