न्यू मीडियाः ‘मंच’, ‘मर्जी’ या ‘मन की बात’

1995 में आम लोगों तक इंटरनेट के प्रसार के बाद से न्यू मीडिया का प्रभाव निरंतर बढ़ता चला गया। इसके कुछ ऐसे माध्यम हैं जैसे फेसबुक आदि का खुब विकास एवं विस्तार हुआ है। न्यू मीडिया के विस्तार और प्रभाव वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश मिश्र की रिपोर्ट।

आए दिन आप सहज ही नियमित रूप से देख सकते हैं कि फेसबुक पर आपके सूची के मित्र, किसी मित्रों से मिलते, खाना खाते, मित्र के साथ चाय पीते व ऐसे ही ऐसे अनेकों निजी व फिजुल की तस्वीरें लगा रहे हैं। इतना ही नहीं मौका पाकर कुछ ऐसे पोस्ट को आपके साथ जोड़ देंगे जिसे न तो सभ्य समाज पसंद करता है और न ही ऐसे पोस्ट जोड़ने वाले मित्र करते होंगे।

पत्रकारिता के प्रारंभ से लेकर विकास तक के सफर में कई सदियों तक इसके माध्यम से रूप में प्रिंट मीडिया का एक छत्रराज रहा। बिना किसी रूकावट और किसी रोकटोक प्रिंट मीडिया का विकास निर्विवाद रूप से होता रहा। लंबे आरसे तक पत्रकारिता के दूसरे माध्यमों जैसे लोकनाटक, लोक कथा, रेडियो, ग्रामीण बैठकें आदि के अलावा लोगों कीसपूर्णता, गंभीरता और विस्तार से समाचारों को लेकर प्रिंट मीडिया की तरफ से झुकावा रहा।

इन सब के बावजूद करीब दो दशक पहले बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का उदय हुआ और इसने सदियों से चली आ रही प्रिंट मीडिया की शांति को अचानक से भंग करना शुरू कर दिया।

इसका असर जिला से लेकर प्रखंड और कस्बाई स्तर तक हुआ। पत्रकारिता और पत्रकार के चैन को छीन लिया। साथ ही खबरों के तह में जाकर जानकारी जुटाने, राज और समाज को सजग करने और इस पर गंभीरता से चिंतन करने की बात दूर होते गई। हालांकि दोनो माध्यमों का विकास अपने-अपने तरीके से होता गया। एक राज्य में एक संस्करण निकलने वाले अखबारों का इतना विकास हुआ कि हर जिले का अपना संस्करण होने लगा है। जबकि खबरिया चैनलों ने भी क्षेत्रीय स्तर पर विकास किया।

इससे यह हुआ कि जहां एक जिले में एक या दो पत्रकार या संवाददाता होते थे। लेकिन, अब स्थिति यह है कि एक जिले में सैकड़ों की संख्या में पत्रकार या संवाददाता है। भले यह अलग बात है कि अवैतनिक प्रतिनिधियों की संख्या भी कम नहीं है।

इन सब के बाद मीडिया के इन आयामों में क्रांतिकारी परिवर्तन तक आया जब न्यू मीडिया ने दस्तक देने शुरू कर दी।

1995 में आम लोगों तक इंटरनेट के प्रसार के बाद से न्यू मीडिया का प्रभाव निरंतर बढ़ता चला गया। इसके कुछ ऐसे माध्यम हैं जैसे फेसबुक आदि का खुब विकास एवं विस्तार हुआ है। विशेषज्ञ बड़े पैमाने पर निजी भावों की अभिव्यक्ति से ज्यादा इस माध्यम की भूमिका को नहीं देख पा रहे हैं।

आए दिन आप सहज ही नियमित रूप से देख सकते हैं कि फेसबुक पर आपके सूची के मित्र, किसी मित्रों से मिलते, खाना खाते, मित्र के साथ चाय पीते व ऐसे ही ऐसे अनेकों निजी व फिजुल की तस्वीरें लगा रहे हैं। इतना ही नहीं मौका पाकर कुछ ऐसे पोस्ट को आपके साथ जोड़ देंगे जिसे न तो सभ्य समाज पसंद करता है और न ही ऐसे पोस्ट जोड़ने वाले मित्र करते होंगे। इसके अलावा ये पोस्ट मीडिया के मूल्यों और मुद्दों से कोसो दूर भी रहता है। हालांकि वे इसे अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ कर देखते हैं।
ठीक है फेसबुक, वाट्सअप जैसे न्यू मीडिया के माध्यमों में कुछ भी लिखने की आजादी है। लेकिन, कुछ भी लिखने और दिखाने की आजादी पारंपरिक, प्रिंट, इलेक्टॉनिक मीडिया में अभी भी कम है। मुद्दों और मूल्यों को लेकर हमेशा से आत्ममंथन व स्वअध्ययन की मांग समय-समय पर होते रहती है।

न्यू मीडिया के माध्यमों में कुछ बातुनी टाइप के लोग मजा ले रहे हैं। ठीक वैसे ही है जैसे अखबार और पत्रिकाओं का गॉसिप लिखने वाले आनंद लेते हैं। जानकार मानते हैं कि बतकही या गॉसिप से अभिव्यक्ति की शक्ति का विकास नहीं होता। बतकही या गॉसिप से माध्यम मजबूत नहीं बनता। माध्यम ताकतवर तब बनता है जब उस पर आधुनिक विचारों का प्रचार-प्रसार हो। समाचार लिखे जाएं, सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों और समस्याओं के साथ विचार व माहौल बनाए जाएं।

न्यू मीडिया के रूप में प्रसारित फेसबुक अभी हल्के-फुल्के विचारों, समाचारों की अभिव्यक्ति के साथ जुड़ा है। लेकिन, कुछ लोगों का मानना है कि यह पासटाइम या मजा लेने के माध्यम से ज्यादा कुछ नहीं है। अधिकांश लोग इसी रूप में उसका इस्तेमाल भी करते हैं। मगर, फेसबुक एक सीमा तक ही पासटाइम माध्यम बन सकता है। यह सामाजिक परिवर्तन का भी वाहक बन सकता है और अभी हाल के दिनों में दिख भी रहा है। जैसे दिल्ली विधानसभा का चुनाव या केंद्र की नई सरकार इन माध्यम पर जोर देकर लोगों से विचारों व खबरों का अदान-प्रदान कर रही है। आपको जानकर यह आश्चर्य होगा कि विदेश मंत्रालय की ओर से प्रेस कांफ्रेंस फेसबुक पर किया जा रहा है।
फेसबुक बेहद शक्तिशाली माध्यम है इसकी समग्र शक्ति का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इस माध्यम को अपनी पहचान तब ही मिलेगी। जब फेसबुक वाले लोग गंभीरता के साथ देश के आर्थिक-राजनीतिक सवालों पर लिखें। खबरें लिखें। खासकर छोटे, मझौले व कस्बाई शहर व गांवों तक अब जरुरत है, राजनीतिक हालात, राज व समाज पर लिखने की।

समस्या है फेसबुक का पेट भरने की। देखना होगा फेसबुक के मित्र- यूजर किन चीजों से पेट भर रहे हैं। खासकर हिन्दी के फेसबुक मित्र किस तरह की चीजों और विषयों के संचार के लिए इस माध्यम का इस्तेमाल कर रहे हैं ? अभी एक बड़ा हिस्सा गली-चौराहों की पुरानी बातचीत की शैली और अनौपचारिकता को यहां ले आया है। इससे जहां एक ओर परंपरागत रूप से चली आ रही निजी बातें खत्म हुई हैं। वहीं दूसरी ओर वर्चुअल संचार में इजाफा हुआ है।

-ओम प्रकाश मिश्र, पत्रकार, गोपालगंज

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