गोपालगंज में हत्या के आरोप में ससुर गए जेल, मायके में जिंदा मिली बहू !

गोपालगंज में एक ससुर पर बहू की हत्या का आरोप लगा। पुलिस ने अपने अनुसंधान में घटना को सत्य पाया और बीना देर किये आरोपी ससुर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। अब करीब एक साल बाद बहू अपने मायके में हट्टी कट्टी खाती पीती जिंदा मिली है।

मामला लालू के गृह जिले गोपालगंज के बुजुर्ग विक्रमा पाल से जुड़ा है। यह बुजुर्ग खिचता सिसकता रहा और खुद को लगातार बेकसूर कहता रहा, लेकिन पुलिस ने एक न सुनी। पुलिस ने उन्हें जेल भेज दिया। हद तो यह है कि पुलिस ने अपने अनुसंधान में कांड को सत्य पाते हुए उनके खिलाफ आरोप पत्र भी समर्पित कर दिया।

बहू की हत्या की सजा काट रहे बुजुर्ग विक्रमा पाल की लाइफ में ट्विस्ट तब आया, जब घटना के करीब एक साल बाद अचानक क़त्ल कर दी गई बहू मंजू जिंदा प्रकट हो गयी। खुद पुलिस ने ही कथित रूप से मार डाली गई घोषित बहू को उसके मायके से ही बरामद कर लिया। बरामद महिला को कोर्ट में बयान भी दिया है।

जानकारी के अनुसार, उत्तरप्रदेश के कुशीनगर जिले के खामपार थाना क्षेत्र के परोहा उत्तर टोला गांव के सत्यनारायण पाल ने अपनी पुत्री मंजू देवी की शादी विक्रमा पाल के पुत्र गुड्डू पाल के साथ वर्ष 2013 में की थी। शादी के बाद मंजू अपने ससुराल गयी। गत वर्ष मार्च माह में सत्यनारायण पाल ने मंजू देवी की दहेज में बाइक के लिए हत्या किए जाने के आरोप में अपने दामाद गुड्डू पाल व समधी विक्रमा पाल सहित तीन लोगों के विरुद्ध नगर थाने में एफआइआर दर्ज करायी।

पुलिस ने आरोपी ससुर विक्रमा पाल को 21 मार्च 2015 को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। पुलिस ने गिरफ्तार विक्रमा पाल के विरुद्ध 21 जुलाई को आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया। आरोप पत्र के आलोक में न्यायालय ने आरोपी के विरुद्ध संज्ञान भी ले लिया। बाद में हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद विक्रमा जेल से बाहर आए। जेल से बाहर आने के बाद भी खुद के बेकसूर होने की बात कहते रहे।खैर वक्त बीता बेकसूर विक्रमा पाल को विश्वस्त सूत्र से जानकारी मिली की उनकी बहु जिन्दा है और मायके में रह रही है। विक्रमा जब पूर्णतया आश्वस्त हो गये तो पुलिस को सच से अवगत कराया और न्याय की गुहार लगाई।

इसके बाद नगर थाना पुलिस को सूचना मिली कि मंजू देवी अभी जिंदा है और अपने मायके में रह रही है। इसके बाद नगर थाना के दारोगा बालेश्वर पासवान ने मंजू के मायके में छापामारी कर उसे जिंदा बरामद कर लिया। उसके जिंदा मिलने के बाद इस कथित दहेज हत्या के अनुसंधान को लेकर पुलिस पर सवाल उठने लगे हैं।

वही बुढ़ापे में बिना किसी जुर्म के विक्रमा पाल को जेल की सजा भुगतनी पड़ी। साथ ही मानसिक शारिरिक और सामाजिक कष्ट सहने पड़े उनका क्या? सवाल उठता है? आखिर ये कैसा अनुसन्धान है पुलिस के उस अधिकारी का जो जिन्दा को मुर्दा और जो घटना हुई ही नहीं उसको भी सत्य बता देता है। आखिर कौन है विक्रमा पाल की दुर्गति और कष्ट का ज़िम्मेदार ?

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