आरक्षण, बीफ, जाति और दाल ने बदला बिहार का चुनावी समीकरण

12 अक्टूबर को पहला वोट पड़ने से पहले लग रहा था कि बिहार विधानसभा चुनावों में हार-जीत का अंतर काफी कम होगा क्योंकि दोनों ही मुख्य प्रतिद्वंद्वियों, बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला महागठबंधन, में तगड़ा मुकाबला था.

अब जबकि दो चरणों के बाद राज्य की 243 विधानसभा सीटों में से 81 सीटों के लिए वोटिंग हो चुकी है, ऐसा लगता है बिहार की जनता ने अपने वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मनोवैज्ञानिक बढ़त दे दी है.

अपने 30 साल लंबे राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन चुनावों में से एक में ताल ठोक रहे नीतीश को खुद से ज्यादा बीजेपी को धन्यवाद कहना चाहिए, जिसने सही मायनों में ‘लड़ाई’ शुरू होने के पहले ही अपने पैरों में गोली मार ली.

बीजेपी का दुर्भाग्य

बीजेपी को चार मुद्दों, आरक्षण, बीफ, जाति और दाल, पर आत्मनिरीक्षण की जरूरत है. इन्हीं मुद्दों ने धारा को बीजेपी के विपरीत मोड़ दिया. पार्टी के रणनीतिकार सत्ता के नशे में कुछ यूं चूर हुए कि एक के बाद एक गलतियां करते गए.

मीडिया का एक बड़ा धड़ा बिहार चुनावों को अगड़ा बनाम पिछड़ा की लड़ाई बनाने के लिए लालू प्रसाद को दोष दे सकता है. लेकिन हकीकत तो यह है कि इसकी शुरुआत अमित शाह ने की थी जब उन्होंने लगभग दो महीने पहले गर्व से कहा था कि यह बीजेपी ही थी जिसने देश को पहला पिछड़ा प्रधानमंत्री दिया था.

हमारे जैसे बहुलतावादी समाज में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पद को आजतक अगड़ा और पिछड़ा की दृष्टि से नहीं देखा गया था. अमित शाह के इस दावे के बाद मंडल राज के चैंपियन लालू भी मैदान में कूद गए और दावा किया कि यह उनकी पार्टी थी जिसने 1996 में देवेगौड़ा के रूप में देश को पहला ओबीसी प्रधानमंत्री दिया था.

एक नजर

  • लहर नीतीश के पक्ष में मुड़ गई
  • दो चरणों के चुनाव के बाद लगता है कि बिहार की लड़ाई ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मनोवैज्ञानिक बढ़त दे दी है
  • बीजेपी को चार मुद्दों, आरक्षण, बीफ, जाति और दाल, पर आत्मनिरीक्षण की जरूरत है, जिन्होंने धारा को इसके विपरीत मोड़ दिया
  • आरक्षण पर मोहन भागवत के बयान जाति से ग्रसित बिहार के वोटरों के गले नहीं उतरे
  • आम आदमी जरूरी चीजों की बढ़ती कीमतों से परेशान था, बिहार के अंदरूनी इलाकों के लिए बीफ कोई मुद्दा ही नहीं था
  • दालों की कीमतों के पिछले साल के 75 रुपये से इस साल 200 रुपये तक पहुंच जाने पर बिहार के वोटरों ने मोदी के अच्छे दिन के वादों के बारे में सवाल पूछना शुरू कर दिया

नीतीश के लिए फायदा

मामले को और खराब करते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने संघ के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर को दिए एक इंटरव्यू में यह कहकर बवाल खड़ा कर दिया कि अब आरक्षण नीति की समीक्षा का वक्त आ गया है. इसके बाद जातीय भावना से ग्रसित बिहार में पहले दो चरणों के चुनावों में कथित तौर पर वैसा ही ध्रुवीकरण देखा गया, जैसा 1995 में देखा गया था. तब पिछड़ों और दलितों ने लामबंद होकर लालू को लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट किया था.

गौरतलब है कि 1995 के विधानसभा चुनाव अगस्त 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद बिहार के पहले पहले चुनाव थे.

बीफ दूसरा ऐसा मुद्दा रहा जिसने नीतीश कुमार के महागठबंधन को अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी पर बढ़त दे दी. एक ऐसे समय में जब युवा बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे हों, (लोकसभा चुनावों के प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी के हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा करने के दावे के बावजूद) और आम आदमी आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों से परेशान हो, बिहार के अंदरूनी इलाकों में बीफ शायद ही कोई मुद्दा हो. यह सिर्फ टीवी चैनलों में ही बहस का मुद्दा बना रहा.

अपनी एक रैली में नीतीश ने कहा भी था कि बीफ मुद्दे को उत्तर प्रदेश से ठीक वैसे ही आयातित किया जा रहा है जैसे बीजेपी ने अपनी ताकत दिखाने के लिए दिल्ली, गुजरता और राजस्थान से नेता आयातित किए हैं.

कहां हैं अच्छे दिन?

प्लान ए (आरक्षण) और प्लान बी (बीफ) के फेल होने के बाद बीजेपी ने जाति के मुद्दे को हवा दी. पार्टी ने इसके लिए राज्य में ऊंची जाति के अपने सबसे जानेमाने चेहरे गिरिराज सिंह को आगे किया. बिहार की ताकतवर भूमिहार जाति से ताल्लुक रखने वाले इस नेता ने एक बयान में कहा कि यदि बीजेपी सत्ता में आती है तो किसी अगड़े को बिहार का मुख्यमंत्री नहीं बनाएगी.

ऐसे समय में यह एक अनचाहा बयान था जब बीजेपी के शीर्ष नेता बार-बार यह कह रहे थे कि मुख्यमंत्री का नाम पार्टी का पार्लियामेंट्री बोर्ड तय करेगा. लेकिन गिरिराज सिंह के बयान ने अगड़ी जातियों के कम से कम ऐसे आधा दर्जन बीजेपी नेताओं का दिल तोड़ दिया, जो मुख्यमंत्री बनने का सपना पाले थे. इस बयान से अगड़ी जातियों का एक बड़ा धड़ा भी चिढ़ गया, हालांकि उसके पास कुछ ज्यादा विकल्प मौजूद नहीं थे.

चौथा और सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा दाल बनी. पिछले साल के 75 रुपये किलो से इस साल 200 रुपये किलो तक की ऊंची छलांग मारने वाली दाल ने वोटरों को पीएम मोदी से अच्छे दिन के वादों के बारे में सवाल करने का मौका दे दिया. मामले को और बिगाड़ते हुए मोतिहारी (बिहार) से बीजेपी सांसद और केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने दाल की बढ़ती कीमतों के लिए नीतीश को जिम्मेदार ठहरा दिया.

इस सवाल का जवाब मिलना मुश्किल है कि क्यों राधा मोहन सिंह ने इसके लिए नीतीश को जिम्मेदार ठहराया और हंसी के पात्र बने. जब नीतीश ने राधा मोहन से पलटकर पूछा कि क्या दाल की कीमतें केवल बिहार में बढ़ी हैं, तो इस बीजेपी नेता को कोई जवाब नहीं सूझा. बीजेपी की तरफ से आया कोई और अनर्गल बयान इन चुनावों में बीजेपी को महंगा पड़ सकता है.

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