मुजफ्फरपुर में मानवता हुई शर्मशार, लवारिश महिला के शव को कचड़े के ठेले में ठूंसने की कोशिश

मुजफ्फरपुर : कहते हैं कि ईश्वर के बाद कोई जीवनदाता होता है, तो वह चिकित्सक है. चिकित्सक हमेशा सेवा धर्म हमारा और सर्वे संतु निरामया के पदचिह्नों पर चलते हैं. अस्पताल इंसान के लिए मंदिर, तो चिकित्सक भगवान होते हैं, लेकिन क्या ऐसा वास्तव में होता है? हम आपको दिखाते हैं, बिहार के मुजफ्फरपुर में स्थित श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज में हुई मानवता को तार-तार कर देने वाली एक ऐसी घटना, जिसे देखकर और जानकर आपकी रूह कांप जायेगी. जी हां, मेडिकल कॉलेज के कैंपस के अंदर स्थित पार्क में एक बुजुर्ग महिला 15 दिनों तक पहले तड़पती रही. उसके बाद बुधवार को उसकी मौत हो गयी. जिंदा थी, तो किसी ने कुछ नहीं किया, मरने के बाद जो उसके शव के साथ किया गया वह पूरे समाज को झकझोर देने वाली घटना है.

मुजफ्फरपुर में कचड़े के ठेले पर एक इंसानी जिस्म को जबरन ठूंसने की कोशिश कर रहे यह दोनों लोग, श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के कर्मचारी हैं. जरा ध्यान से देखिए, जिस तरह यह बुजुर्ग महिला के शव को कचरे के ठेले में ठूंसने की कोशिश कर रहे हैं, शायद वह वास्तविक कचरे को भी इस तरह नहीं रखते होंगे. यह दृश्य जिले के सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का है. जिस इंसानी जिस्म के साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं, वह एक बुजुर्ग महिला थी. जानकारी के मुताबिक बुजुर्ग महिला लावारिश थी, और उसके आगे पीछे कोई नहीं था. अस्पताल के माली की मानें तो वह पंद्रह दिनों से पार्क में तड़प रही थी. माली कंचन ने बताया कि उसने कई दिन जाकर अस्पताल के डॉक्टरों को इसकी सूचना दी, लेकिन किसी का दिल नहीं पिघला, अंततः बुधवार को उस बुजुर्ग महिला के प्राण पखेरू उड़ गये.

महिला की मौत के बाद भी अस्पताल प्रशासन नहीं जागा. सरकार द्वारा बनायी गयी लावारिस शवों के लिए कानून का ख्याल किसी को नहीं आया, जबकि नियमानुसार ऐसे शवों का पहले पोस्टमार्टम होता है. साथ ही, शव ले जाने के लिए सरकारी मोर्चरी वैन होते हैं. इस वैन से ऐसे शवों को अंतिम संस्कार और पोस्टमार्टम के लिए ले जाया जाता है. अस्पताल प्रशासन ने शव ले जाने के लिए मोर्चरी वाहन की जगह कचरे के ठेले का प्रयोग किया. ज्ञात हो कि अज्ञात और लावारिस शव के अंतिम संस्कार के लिए सभी सरकारी अस्पतालों और कॉलेजों में पर्याप्त फंड होता है, लेकिन वह फंड कहां जाता है, इस शव के साथ जो हुआ, उसे देखकर आपको अंदाजा हो गया होगा. जिले की सिविल सर्जन ललिता सिंह कहती हैं कि ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए, क्योंकि हमारे पास मोर्चरी वैन है.

बुजुर्ग महिला लावारिस थी, यह सत्य है, लेकिन वह इस राज्य और समाज की रहने वाली थी. उसे भी संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार प्राप्त थे. वह लाचार थी, बेजार थी और बीमार थी. जीवन की अंतिम घड़ी में उसने सोचा कि वह लोक कल्याणकारी राज्य में स्थित किसी अस्पताल में चली जाये, शायद जीवन की अंतिम घड़ी कष्ट से नहीं बीते. उसे क्या पता था, यहां भी जिंदा यमराज बैठे हैं. राज्य के स्वास्थ्य विभाग के मैनुअल के मुताबिक बुजुर्ग महिला के शव के साथ मानवता को तार-तार कर देने वाली घटना हुई है. जानकारों की मानें तो इस घटना पर प्रतिक्रिया देने में भी उन्हें कई बार सोचना पड़ रहा है. उनके मुताबिक इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि बिहार के ज्यादातर सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में व्यवस्था काफी दयनीय है.

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